(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.148. अध्यायः 148
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति यतिशुश्रूषाप्रशंसनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

`पराशर उवाच।

न तथा सम्प्रदानेन नोपवासादिभिस्तथा।
इष्टां गतिमवाप्नोति यथा शुश्रूषकर्मणा॥ 13-148-1(87158)
यादृशेन तु तोयेन शुद्धिं प्रकुरुते नरः।
तादृग्भवति तद्धौतमुदकस्य प्रभावतः॥ 13-148-2(87159)
शूद्रोप्येतेन मार्गेण यादृशं सेवते जनम्।
तादृग्भवति संसर्गादचिरेण न संशयः॥ 13-148-3(87160)
तस्मात्प्रयत्नतः सेव्या भिक्षवो नियतात्मना।
उदकग्राहणाद्येन स्नपनोद्वर्तनैस्तथा॥ 13-148-4(87161)
अध्वना कर्शितानां च व्याधितानां तथैव च।
शुश्रूषां नियतं कुर्यात्तेषामापदि यत्नतः॥ 13-148-5(87162)
दर्भाजिनान्यवेक्षेत भैक्षभाजनमेव च।
यथाकामं च कार्याणि सर्वाण्येवोपसाधयेत्।
प्रायश्चित्तं यता न स्यात्तथा सर्वं समाचरेत्॥ 13-148-6(87163)
व्याधितानां तु भिक्षूणां चेलप्रक्षालनादिभिः।
प्रतिकर्मक्रिया कार्या भेषजानयनैस्तथा॥ 13-148-7(87164)
पिंषणालेपनं चूर्णं कषायमथ साधनम्।
नान्यस्य प्रतिचारेषु सुखार्थमुपपादयेत्॥ 13-148-8(87165)
भिक्षाटनोऽभिगच्छेत भिषजश्च विपश्चितः।
ततो विनिष्क्रियार्थानि द्रव्याणि समुपार्जयेत्॥ 13-148-9(87166)
यश्च प्रीतमना दद्यादादद्याद्भेषजं नरः।
अश्रद्धया हि दत्तानि तान्यभोक्ष्याणि भिक्षुभिः॥ 13-148-10(87167)
श्रद्धया यदुपादत्तं श्रद्धया चोपपादितम्।
तस्योपभोगाद्धर्मः स्याद्व्याधिभिश्च निवर्त्यते॥ 13-148-11(87168)
आदेहपतनादेवं शुश्रूषेद्विधिपूर्वकम्।
न त्वेवं धर्ममुत्सृज्य कुर्यात्तेषां प्रतिक्रियाम्॥ 13-148-12(87169)
स्वभावतो हि द्वन्द्वानि विप्रयान्त्युपयान्ति च।
स्वभावतः सर्वभावा भवन्ति नभवन्ति च।
सागरस्योर्मिसदृशा विज्ञातव्या गुणात्मकाः॥ 13-148-13(87170)
विद्यादेवं हि यो धीमांस्तत्ववित्तत्वदर्शनः।
न स लिप्येत पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥' ॥ 13-148-14(87171)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः॥ 148 ॥


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